एकाम्रक, विंदुसर शिवतीर्थ-पुरुषोत्तम कृष्णतीर्थ

ब्रम्हपुराण में वर्णन हैं कि एकाम्रक शिवतीर्थ में वाराणसी की तरह कोटि शिवलिंग हैं, यहाँ आठ तीर्थ हैं। सभी ओर सफेद रंग के महल हैं, नगर की चार दिवारी भी सफेद रंग की हैं। सभी ऋतु में प्रफुल्लित रहनेवाले अनेकों फूल-फलों के वृक्ष हैं। अनेकों पंछी और जलाशय हैं। इस क्षेत्र में शंकर भगवान का निवास हैं।

विंदुसर नाम के तीर्थ में पृथ्वीपर जितना भी जलक्षेत्र हैं उन सब की अलग बूंदे शंकर भगवान ने यहाँ संग्रहीत की हैं।

वहाँ स्त्री-पुरुष, सभी वर्णों के लोग, शास्त्रज्ञानी तथा संपन्न लोग रहते हैं।

उस क्षेत्र में निर्धन, मूर्ख,परद्वेषी, परनिंदक, रोगी, मलिन, नीच, दुराचारी लोग नहीं रहते।

अगहन याने मार्गशीर्ष महीने में, कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, विषुव योग में विंदु सरोवर में स्नान करके तिल और जल से नाम-गोत्र का उच्चारण करते हुये देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और पितरों का तर्पण करना चाहिए।

ग्रहण काल में विषुव योग में, संक्रांति में, अयन के आरंभ में, छियासी तिथि, युग तिथि या अन्य शुभ तिथि में दानधर्म करना चाहिए।

जो यहाँ पूजा-पाठ दानधर्म करते हैं उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल और अन्य तीर्थों की अपेक्षा सौगुना पुण्य मिलता हैं।

स्नान के बाद शंकर मंदिर में प्रवेश करें। घृत, दूध से शंकर को स्नान कराकर उसपर चंदन और केशर लगाये। फूल, बिल्वपत्र अर्पण करें। नैवेद्य अर्पण करें। शिव के वैदिक, तांत्रिक अथवा मूलमंत्र का जप करना चाहिए। भजन-कीर्तन करना चाहिए। उनकी पूजा करके तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

भगवान शिव से चारों मुख्य दिशाओं में ढाई योजन तक यह क्षेत्र भोग और मोक्ष प्रदान करता हैं।

वहीं भास्करेश्वर नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग हैं। वहाँ भी पूजा-पाठ करनेवाले शिवलोक पाते हैं, वेदज्ञानी होते हैं, मोक्षशास्त्र को समझ पाते हैं। वहाँ और भी तीर्थ और मंदिर हैं।

शंकर भगवान के साथ ही वहाँ कृष्ण भगवान भी पुरुषोत्तम नाम से स्थित हैं। जो वहाँ पूजा-पाठ करता हैं वह यमलोक की बजाय स्वर्गलोक में बसता हैं। उसे जीवन में श्रेष्ठता मिलती हैं। उसका जीवन सफल होता हैं।

एक आम्र का मतलब एक आम ऐसा बताया जाता हैं। यह क्षेत्र भुवनेश्वर में आता हैं।

विंदुसर नाम से तीर्थ की ठीक से जानकारी नहीं मिल पायी लेकिन बिंदु सरोवर नाम से एक तीर्थक्षेत्र गुजरात में सिद्धपुर में हैं।

भास्करेश्वर तीर्थ भुवनेश्वर, ओडिसा में हैं।

इस भाग में इतना ही।

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