पंचांगन्यास और चतुर्व्यूह न्यास
देवताओं और पितरों का तर्पण करने के बाद मौन भाव से आचमन करके समुद्र तटपर एक हाथ का चौकोर बनाये। उस मंडल के चार दरवाजे होने चाहिए। उसके अंदर कर्णिका सहित अष्टदल कमल की आकृति बनाये। अष्टदल कमल में अष्टाक्षर मंत्र से श्रीविष्णु का पूजन करें।
शरीर शुद्धि की विधि इस प्रकार हैं:
हॄदय में अ कारक़ा चक्र रेखा सहित ध्यान करना चाहिए। वह तीन शिखाओं में प्रज्वलित होकर पापों का नाश करती हैं ऐसी भावना मन में होनी चाहिए।
मस्तक में रा का ध्यान करना चाहिए, वह चंद्र मंडल के मध्य भाग में स्थित हैं और शुक्लवर्ण का हैं, वह अमृत वर्षा करके पृथ्वी को जलमय करता हैं। इस प्रकार ध्यान करने से साधक के पाप धुलकर शरीर दिव्य हो जाता हैं।
शरीर शुद्धि के बाद अष्टाक्षर मंत्र का न्यास करना चाहिए। अष्टाक्षर मंत्र से अंगन्यास करने के बाद कर शुद्धि करनी चाहिए।
दोनों हाथों की आठों उंगलियों में अंगूठे से अष्टाक्षर मंत्र का न्यास करना चाहिए। इससे आठ उंगीलियों पर आठ अक्षर का न्यास हो जाता हैं।
मंत्र: ॐ नमो नारायणाय
अंगन्यास के लिए ॐ कार के उच्चारन के साथ, बायें पैर में शुक्ल वर्ण की पृथ्वी का न्यास करना चाहिए।
दायें पैर में न कार का न्यास करना चाहिए, उसका वर्ण श्याम हैं और उसके देवता शंभु हैं।
मो कारक़ा न्यास बायी कटी में होना चाहिए। इसे कालस्वरूप माना गया हैं।
ना कार सर्वबिज स्वरुप हैं, इसका न्यास दांयी कटी में करना चाहिए।
रा कार का स्वरुप तेजोमय होता हैं, उसका न्यास नाभि प्रदेश में होना चाहिए।
य कारक के देवता वायु हैं, उसका न्यास बायें कंधे में होना चाहिए।
णा कार का स्वरुप सर्वव्यापी हैं, उसका न्यास दायें कंधे में करना चाहिए।
आखरी य कार का न्यास मस्तक में करना चाहिए। इसमें सभी लोक स्थित होते हैं ऐसा माना जाता हैं।
इस तरह से ॐ नमो नारायणाय इस अष्टाक्षर मंत्र का न्यास शरीर में हो जाता हैं।
पंचांगन्यास विधि इस प्रकार हैं:
ॐ विष्णवे नमः शिरः, कहकर मस्तक का स्पर्श करना चाहिए।
ॐ ज्वलनाय नमः शिखा, कहकर शिखा का स्पर्श करना चाहिए।
ॐ विष्णवे नमः कवचम्, कहकर दोनों हाथों के मूलों का स्पर्श करना चाहिए।
ॐ विष्णवे नमः स्फुरणं दिशोबन्धाय, कहकर सभी ओर चुटकी बजानी चाहिए।
ॐ हुं फट् अस्त्रम्, कहकर ताली बजानी चाहिए।
चतुर्व्यहन्यास विधि इस प्रकार हैं:
ॐ शिरसि शुक्लो वासुदेव इति, कहकर मस्तक का स्पर्श करना चाहिए।
ॐ आं ललाटे रक्तः संकर्षणो गरुत्मान् वह्निस्तेज आदित्य इति, कहकर माथे का स्पर्श करना चाहिए।
ॐ आं ग्रीवायां पीतः प्रद्युम्नो वायुमेघ इति, कहकर गर्दन का स्पर्श करना चाहिए।
ॐ आं हृदये कृष्णोऽनिरुद्धः सर्वशक्तिसमन्वित इति, कहकर हॄदय का स्पर्श करना चाहिए।
इस प्रकार अपने आत्मा का चतुर्व्यह रूपसे चिन्तन करके कार्य आरम्भ करना चाहिए।
इस विषय की जानकारी अभी और भी हैं पर उसे हम जानेंगे अगले भाग में, इस भाग में इतना ही।
हमारें वीडियो और पोस्ट में दी जानेवाली जानकारी को देखने और ड्राफ्ट को कॉपी पेस्ट करने के लिए आप हमारे यूट्यूब चैनल, ब्लॉग, फेसबुक, न्यूज वेबसाइट को विजिट कर सकते हैं।
उनमें लिखें टेक्स्ट को कॉपी पेस्ट करके अपने लिए नोट्स बना सकते हैं।
यदि फिर भी कोई समस्या आ रही हैं तो वीडियो और पोस्ट में दी गयी मेल आईडी पर मेल करें या सोशल मीडिया पर मैसेज करें। हम यथासंभव सभी को जानकारी देने की कोशिश करेंगे।
ज्योतिष संबंधी मेल आईडी- pmsastrology01@gmail.com
धर्मग्रंथ संबंधी मेल आईडी- dharmgranthpremi@gmail.com
आपका फोन आने पर हम बिजी रहेंगे तो बात नहीं हो पायेगी, इसलिए मेल आईडी पर ही अपने सवाल पूछे या सोशल मीडिया पर मैसेज करें।
हमें जब भी वक़्त मिलेगा रात-देर रात आपके सवालों का जवाब देने की कोशिश करेंगे।
हमारे कंटेंट को ढूंढने के लिए कुछ आसान कीवर्ड्स इस प्रकार हैं-
pm ke pen se
pm ke pen se brahma puran
pm ke pen se tarot card
pm ke pen se kundali jyotish
pm ke pen se dharmgrantho se upay, upachar aur uargdarshan
dharmgrantho se upay, upachar aur uargdarshan
धन्यवाद!
Author: sarvendra chauhan
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to print (Opens in new window) Print
- Click to email a link to a friend (Opens in new window) Email
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on Threads (Opens in new window) Threads
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp










