मार्कंडेश्वर पूजा विधि

मार्कंडेश्वर पूजा विधि

ब्रह्मपुराण अनुसार मार्कंडेश्वयहृद में तीन बार डुबकी लगाकर भगवान शंकर का यह मंत्र उच्चारण करना चाहिए।

शिव मंत्र इस प्रकार हैं:

संसारसागरे मग्रं पापग्रस्तमचेतनम्। त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते॥

नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च। स्नानं करोमि देवेश मम नश्यतु पातकम्॥

इस मंत्र के बाद नाभि की ऊँचाई तक पानी में स्नान करके देवताओं और ऋषियों का तर्पण करना चाहिए। इसके बाद आचमन करके शिव मंदिर में जाना चाहिए और देवता की परिक्रमा करनी चाहिए।

परिक्रमा के बाद मूल मंत्र या अघोर मंत्र में से किसी मंत्र से शंकर पूजा करके उन्हें प्रणाम करना चाहिए।

मूल मंत्र:

मार्कडेश्वराय नमः

अघोर मंत्र:

ॐअघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः।

मूल मंत्र या अघोर मंत्र के बाद यह मंत्र बोले और शंकर भगवान को प्रसन्न करें।

त्रिलोचन नमस्तेऽस्तु नमस्ते शशिभूषण। त्राहि मां त्वं विरूपाक्ष महादेव नमोऽस्तु ते॥

इस प्रकार स्नान और भगवान शंकर के दर्शन और पूजा-पाठ से पापमुक्ति मिलती हैं।

शंकर पूजा के बाद कल्पांतस्थायी वटवृक्ष के पास जाकर उसकी तीन बार परिक्रमा करें।

इसके बाद वटवृक्ष के लिए मंत्र बोले। वटवृक्ष की छाया में पापमुक्ति मिल जाती हैं। राजसूय और अश्वमेध यज्ञ से भी बड़ा फल मिलता हैं। यह वृक्ष भगवान कृष्ण के अंग से प्रकट हुआ हैं इसमें विष्णु का वास हैं, यह ब्रम्हतेज कि तरह तेजोमय हैं। इस वटवृक्ष और गरुड़ का दर्शन करके जो श्रीकृष्ण, बलभद्र, और सुभद्रा देवी का दर्शन करता हैं, वह परम गति को प्राप्त होता हैं।

वटवृक्ष के लिए मंत्र इस प्रकार हैं:

ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महाप्रलयकारिणे। महद्रसोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते॥

अमरस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट। न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते॥

जगन्नाथ श्रीकृष्ण मंदिर में प्रवेश करके तीन प्रदक्षिणा करें और नाममंत्र से बलभद्रजी का पूजन करें।

बलभद्र जी का नाममंत्र इस प्रकार हैं:

नमस्ते हलधृग्राम नमस्ते मुसलायुध। नमस्ते रेवतीकान्त नमस्ते भक्तवत्सल॥

नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते धरणीधर। प्रलम्बारे नमस्तेऽस्तु त्राहि मां कृष्णपूर्वज॥

बलभद्र जी की पूजा के बाद गंध पुष्प आदि सामग्रियों के साथ श्रीकृष्ण की पूजा करें। देवता, योगी और सोमपान कर्ताओं को जो गति नहीं मिलती वह गति कृष्ण पूजा करनेवाले को मिलती हैं। हजारों अश्वमेध यज्ञ, सभी तीर्थस्नान, दानपुण्य, व्रत, उपवास, तपस्या, ब्रम्हचर्य आदि से जो फल मिलता हैं, वहीं फल  कृष्ण नाम स्मरण से और पूजापाठ से मिलता हैं।

श्रीकृष्ण पूजा के लिए द्वादशाक्षरी मंत्र इस प्रकार हैं:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

श्रीकृष्ण पूजा के बाद सुभद्रा देवी के नाममंत्र से उसकी भी पूजा करनी चाहिए। उसके दर्शन और पूजन करनेवाला अपनी इच्छानुसार रफ्तार से चलने वाले विमानद्वारा वैकुंठधाम में जाता हैं।

सुभद्रा देवी का नाममंत्र इस प्रकार हैं:

नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे। त्राहि मां पद्मपत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

इस प्रकार हमने मार्कंडेश्वर पूजा विधि जान ली हैं।

इस भाग में इतना ही।

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