एसआईआर सामान्य सालाना संशोधन से अलग है। इसमें मतदाताओं से नए फॉर्म भरवाए जाते हैं और कुछ को नागरिकता जैसे दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं। इसका मक़सद मतदाता सूची को साफ-सुथरा और सटीक बनाना है। पहले चरण में बिहार में पिछले साल एसआईआर से 6% नाम हटे थे।
यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच विवाद था, जिसे कोर्ट ने सुलझाया और जजों को इसमें शामिल किया।
सही नाम काटे जाने के आरोप–
विपक्षी दल एसआईआर के नाम पर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के नाम काटे जाने के आरोप लगा रहे हैं। चाहे वह, पश्चिम बंगाल हो या फिर, गुजरात, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, या फिर कोई अन्य राज्य। कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल आरोप लगाते रहे हैं कि कुछ जगहों पर मुस्लिम वोटरों के नाम ज्यादा हटाए गए या नाम हटाने की अर्जी फॉर्म 7 का गलत इस्तेमाल हुआ। लेकिन चुनाव आयोग का कहना है कि यह सिर्फ साफ-सफाई का काम है। कोई योग्य वोटर बाहर नहीं होना चाहिए और कोई गलत नाम नहीं रहना चाहिए।
सवाल है कि क्या योग्य मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया गया है? फॉर्म 7 के ग़लत इस्तेमाल का आरोप लगातार लगता रहा है। कई राज्यों में ऐसे मामले आए जहाँ जिंदा लोगों को मृत बताकर नाम काटने के लिए फॉर्म 7 भर दिया गया। लेकिन लोग सबूतों के साथ पहुँच गए कि वे ज़िंदा हैं।
चुनाव आयोग का बयान—
चुनाव आयोग ने कहा है कि मतदाता सूची अपडेट करना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। नाम जोड़ने, हटाने या बदलाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख तक फॉर्म भरे जा सकते हैं। बाकी 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर की तैयारी जल्द शुरू होगी जो अप्रैल 2026 से संभावित है।
Author: sarvendra chauhan
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