नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ( NSE ) को फिलहाल सूचना का अधिकार (RTI) कानून के दायरे में नहीं माना जाएगा। आज यानी 31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें NSE को ‘पब्लिक अथॉरिटी’ घोषित किया गया था। इसके साथ ही, अदालत ने NSE की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए केंद्रीय सूचना आयोग और अन्य पक्षों से चार हफ्ते के अंदर जवाब मांगा है। दरअसल, NSE ने 1 जुलाई को दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्रीय सूचना आयोग के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को RTI कानून के तहत ‘पब्लिक अथॉरिटी’ माना गया था।
अप्रैल 2010 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील हुई थी खारिज
दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने NSE की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने अप्रैल 2010 में सिंगल जज के फैसले को चुनौती दी थी। सिंगल जज ने अपने आदेश में कहा था कि सूचना का अधिकार कानून की धारा 2(h) के तहत नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को ‘पब्लिक अथॉरिटी’ माना जाएगा।
NSE ने क्या दलील दी थी?
इस मामले की शुरुआत तब हुई थी, जब जून 2007 में केंद्रीय सूचना आयोग ने NSE को RTI कानून के दायरे में माना था। इसके खिलाफ NSE सिंगल जज के पास पहुंचा और दलील दी कि वह RTI कानून के तहत ‘पब्लिक अथॉरिटी’ नहीं है। इसलिए उस पर RTI कानून लागू नहीं होना चाहिए।
RTI में ‘पब्लिक अथॉरिटी’ होने का क्या मतलब है?
RTI कानून के तहत कोई भी नागरिक केवल ‘पब्लिक अथॉरिटी’ से ही जानकारी मांग सकता है। यानी अगर किसी संस्था को ‘पब्लिक अथॉरिटी’ माना जाता है, तो आम नागरिक उससे कानून के तहत सूचना मांगने का अधिकार रखते हैं। इसी वजह से यह मामला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Author: sarvendra chauhan
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