पंचांग न्यास और चतुर्व्यूह न्यास के बाद अन्य मंत्र विधि
पिछले भाग में हम पंचांग न्यास और चतुर्व्यूह न्यास की विधि जान चुके हैं। इसके बाद स्वयं के शरीर में भगवान विराजमान हैं यह भावना मन में रखकर कहें कि भगवान विष्णु मेरे आगे हैं, पीछे केशव हैं। दायें भाग में भाग में गोविंद हैं, बायें भाग में मधुसूदन हैं। ऊपर वैकुंठ और नीचे वराह हैं। बीच की दिशाओं में माधव हैं। चलते-फिरते, उठते-बैठते भगवान नृसिंह मेरी रक्षा करते हैं। मैं वासुदेव स्वरुप हूँ। इस प्रकार विष्णुमय होकर पूजन आरंभ करना चाहिए। खुद के शरीर की तरह, भगवान कि मुर्ति में भी सारें तत्वों का न्यास करें। ॐ फट का उच्चारण शुभ हैं और सब विघ्नों को दूर करनेवाला हैं।
सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु और आकाश मंडल का चिंतन करें। कमल के मध्य भाग में विष्णु का न्यास करें। इससे पहले के भाग में हम अष्टदल कमल और मंडल की विधि जान चुके हैं। अष्टदल कमल की प्रत्येक कर्णिका में ॐ नमो नारायणाय इस अष्टाक्षर मंत्र के एक-एक अक्षर लिखें। चाहें तो पूरा मंत्र एक साथ भी इस्तेमाल कर सकते हैं। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का मंत्र जप भी करें।
भगवान का हृदय में ध्यान करके कर्णिका में भी ध्यान करें। ध्यान करने का स्वरुप इस प्रकार हैं:
भगवान की चार भुजायें हैं। वें महान सत्वमय हैं। कोटि-कोटि सूर्य के समान उनके श्री अंगों की प्रभा हैं। वे महायोग स्वरुप, जोतिः स्वरुप हैं, सनातन हैं। इसके बाद मन ही मन भगवान का स्मरण करते हुए मंत्रोच्चार और आवाहन आदि करें।
इसके आगे की जानकारी के लिए कृपया स्क्रीन पर ध्यान बनाये रखें। नॉइज के चलते सॉफ्टवेयर वॉइस इस्तेमाल होती हैं जिसमें शब्दों का उच्चारण ठीक से और लयबद्ध तरीके से नहीं हो पाता। आप स्क्रीनशॉट ले या ब्लॉग और फेसबुक से टेक्स्ट को कॉपी पेस्ट कर ले। फिर भी कोई समस्या हो तो हमें सोशल मीडिया पर मैसेज करें अथवा ईमेल करें। चाहें तो सीधा किताबों में इन्हें पढ़ सकते हैं।
आवाहन मंत्र इस प्रकार हैं:
मीनरूपो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः।
आयातु देवो वरदो मम नारायणोऽग्रतः॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
आसन मंत्र इस प्रकार हैं:
कर्णिकायां सुपीठेऽत्र पद्मकल्पितमासनम्।
सर्वसत्त्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
अर्घ्य मंत्र इस प्रकार हैं:
ॐ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय हृषीकेशाय विष्णवे नमः।
ॐ नमो नारायणाय नमः।
पाद्य मंत्र इस प्रकार हैं:
ॐ पाद्यं पादयोर्देव पद्मनाभ सनातन।
विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन।
ॐ नमो नारायणाय नमः।
मधुपर्क मंत्र इस प्रकार हैं:
मधुपकै महादेव ब्रह्माद्यैः कल्पितं तव।
मया निवेदितं भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
आचमनीय मंत्र इस प्रकार हैं:
मन्दाकिन्याः सितं वारि सर्वपापहरं शिवम्।
गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम्॥
ॐ नमो नारायणाय नमः
स्नान मंत्र इस प्रकार हैं:
त्वमापः पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वायुरेव च।
लोकेश वृत्तिमात्रेण वारिणा स्त्रापयाम्यहम्।।
ॐ नमो नारायणाय नमः।
वस्त्र मंत्र इस प्रकार हैं:
देवतत्त्वसमायुक्त यज्ञवर्णसमन्वित।
स्वर्णवर्णप्रभे देव वाससी तव केशव॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
विलेपन मंत्र इस प्रकार हैं:
शरीरं ते न जानामि चेष्टां चैव न केशव।
मया निवेदितो गन्धः प्रतिगृह्य विलिप्यताम्॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
यज्ञोपवीत मंत्र इस प्रकार हैं:
ऋग्यजुःसाममन्त्रेण त्रिवृतं पद्मयोनिना।
सावित्रीग्रन्थिसंयुक्तमुपवीतं तवार्पये॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
अलंकार मंत्र इस प्रकार हैं:
दिव्यरत्नसमायुक्त वह्निभानुसमप्रभ।
गात्राणि तव शोभन्तु सालंकाराणि माधव॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
धूप मंत्र इस प्रकार हैं:
वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यः सुरभिश्च ते।
मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
दीप मंत्र इस प्रकार हैं:
सूर्यचन्द्रमसोज्र्योतिर्विद्युदग्न्योस्तथैव च।
त्वमेव ज्योतिषां देव दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ नमो नारायणाय नमः।
नैवेद्य मंत्र इस प्रकार हैं:
अन्नं चतुर्विधं चैव रसैः षद्भिः समन्वितम्।
मया निवेदितं भक्त्या नैवेद्यं तव केशव॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
पूर्वोक्त अष्टदल कमल के पूर्वदल में वासुदेव का, दक्षिण दल में संकर्षण का, पश्चिम दल में प्रद्युम्न का, उत्तर दल में अनिरुद्ध का, अग्निकोण दल में वाराह का, नैऋत्य कोण में नरसिंह का, वायव्य कोण में माधव का तथा ईशान में भगवान त्रिविक्रम का न्यास करे।
फिर अष्टाक्षर देव के सम्मुख गरुड की स्थापना करे। भगवान के वाम भाग में चक्र और दक्षिण भाग में शङ्ख की स्थापना करे। इसी प्रकार उनके दक्षिण भाग में महागदा कौमोद की और वाम भाग में शार्ङ्ग नामक धनुष को स्थापित करे। दक्षिण भाग में दो दिव्य तरकस और वाम भाग में खड्ग का न्यास करे।
दक्षिण भाग में श्रीदेवी और वाम भाग में पुष्टि देवी की स्थापना करे। भगवान के सामने वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ रखे। फिर पूर्व आदि चारों दिशाओं में हृदय आदिका न्यास करे। कोण में विष्णु के अस्त्रका न्यास करे। पूर्व आदि आठ दिशाओं में तथा ऊपर और नीचे तांत्रिक मंत्रो से क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, अनन्त तथा ब्रह्माजी का पूजन करे।
ब्रम्हपुराण में वर्णन हैं कि इस प्रकार मंडल में स्थित देवेश्वर जनार्दन का पूजन करके मनुष्य निश्चय ही मनोवांछित भोगों को प्राप्त करता है। इसी विधि से पूजित मंडलस्थ भगवान जनार्दन का जो दर्शन करता है, वह भी अविनाशी विष्णु में प्रवेश करता है। जिसने उपर्युक्त विधि से एक बार भी श्रीकेशव का पूजन किया है, वह जन्म-मृत्यु और जरा अवस्था को लाँघकर भगवान विष्णु के पद को प्राप्त होता है।
‘नमः’ सहित ॐ कार जिसके आदि में और ‘नमः’ जिसके अंत में है, वह ‘ॐ नमो नारायणाय नमः’ यह तेजस्वी मंत्र संपूर्ण तत्वों का मंत्र कहलाता है। इसी विधि से प्रत्येक को गन्ध, पुष्प आदि वस्तुएँ क्रमशः निवेदन करनी चाहिये। इसी तरह क्रमशः आठ मुद्राएँ बाँधकर दिखाये।
फिर मंत्रवेत्ता पुरुष ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मूल मंत्र का एक सौ आठ या अट्ठाईस अथवा आठ बार जप करे। किसी कामना के लिये जप करना हो तो उसके लिये शास्त्रों में जितना बताया गया हो, उतनी संख्या में जप करे अथवा निष्काम भाव से जितना हो सके, उतना एकाग्र चित्त से जप करे।
पद्म, शंख, श्रीवत्स, गदा, गरुड, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष-ये आठ मुद्राएँ बतलायी गयी हैं। जितना हो सके, उतना एकाग्रचित्तसे जप करे। पद्म, शङ्ख, श्रीवत्स, गदा, गरुड, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष-ये आठ मुद्राएँ बतलायी गयी हैं। जो लोग शास्त्रोक्त मंत्रोंद्वारा श्रीहरि की पूजा का विधान न जानते हों, वे ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मूलमंत्र से सदा भगवान अच्युत का पूजन करें।
इसके पहले के भाग और यह भाग मिलकर पूरी पूजा विधि की जानकारी हम ले चुके हैं। आनेवाले भागों में हम अन्य विषयों को जानने की कोशिश करेंगे।
इस भाग में इतना ही।
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धन्यवाद!
Author: sarvendra chauhan
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