रैवत, च्यवन, समय आदि का वर्णन
लोमहर्षणजी ब्रम्हपुराण में आगे वर्णन करते हैं की, नरिष्यन्त के पुत्र शक हुए। नाभाग के राजा अम्बरीष हुए। धृष्ट से धाष्टक नामवाले क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई, जो युद्ध में उन्मत होकर लड़ते थे। करूष के पुत्र कारूष नाम से विख्यात हुए। वे भी रणोन्मत्त थे। प्रांशु के एक ही पुत्र थे, जो प्रजापति के नाम से प्रकट हुए। शर्याति के दो जुड़वीं संतानें हुईं। उनमें अनर्त नाम से प्रसिद्ध पुत्र तथा सुकन्या नामवाली कन्या थी। यही सुकन्या (1.अ. जा.) महर्षि च्यवन की पत्नी हुई। अनर्त के पुत्र का नाम रैव था। उन्हें अनर्त देश का राज्य मिला। उनकी राजधानी कुशस्थली (द्वारका) हुई। रैव के पुत्र रैवत हुए, जो बडे धर्मात्मा थे। उनका दूसरा नाम ककुद्मी भी था। अपने पिता के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण उन्हें कुशस्थली का राज्य मिला। एक बार वे अपनी कन्या को साथ ले ब्रह्माजी के पास गये और वहाँ गन्धर्वों के गीत सुनते हुए (2.अ. जा.) दो घडी ठहरे रहे। इतने ही समय में मानवलोक में (3.अ. जा.) अनेक युग बीत गये। रैवत जब वहाँ से लौटे, तब अपनी राजधानी कुशस्थली में आये; परन्तु अब वहाँ यादवों का अधिकार हो गया था। यदुवंशियोंने उसका नाम बदलकर द्वारवती रख दिया था। उसमें बहुत-से द्वार बने थे। वह पुरी बड़ी मनोहर दिखायी देती थी। भोज, वृष्णि और अन्धक वंश के वसुदेव आदि यादव उसकी रक्षा करते थे। रैवत ने वहाँ का सब वृत्तान्त ठीक-ठीक जानकर अपनी रेवती नाम की कन्या बलदेवजी को ब्याह दी और स्वयं मेरुपर्वत के शिखर पर जाकर वे तपस्या में लग गये। धर्मात्मा बलरामजी रेवती के साथ सुखपूर्वक विहार करने लगे।
पृषध्रने अपने गुरु की गायका वध किया था, इसलिये वे शापसे शूद्र हो गये। इस प्रकार ये वैवस्वत मनु के नौ पुत्र बताये गये हैं। मनु जब छींक रहे थे, उस समय इक्ष्वाकु की उत्पत्ति हुई थी। इक्ष्वाकु के सौ पुत्र हुए। उनमें विकुक्षि सबसे बड़े थे। वे अपने पराक्रम के कारण (4.अ. जा.) अयोध्य नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्हें (5.अ. जा.) अयोध्या का राज्य प्राप्त हुआ। उनके शकुनि आदि पाँच सौ पुत्र हुए, जो अत्यन्त बलवान और उत्तर-भारत के रक्षक थे। उनमें से वशाति आदि अट्ठावन राजपुत्र दक्षिण दिशा के पालक हुए। विकुक्षिका दूसरा नाम शशाद था। इक्ष्वाकु के मरने पर वे ही राजा हुए। शशाद के पुत्र ककुत्स्थ, ककुत्स्थ के अनेना, अनेना के पृथु, पृथु के विष्टराश्व, विष्टराश्व के आर्द्र, आर्द्र के युवनाश्व और युवनाश्व के पुत्र श्रावस्त हुए। उन्होंने ही श्रावस्तीपुरी बसायी थी। श्रावस्त के पुत्र बृहदश्व और उनके पुत्र कुवलाश्व हुए। ये बड़े धर्मात्मा राजा थे। इन्होंने धुन्धु नामक दैत्य का वध करने के कारण धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि प्राप्त की।
अधिक जानकारी
1. च्यवन ऋषि – च्यवन ऋषि हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण ऋषि थे। वे भृगु ऋषि के पुत्र थे और अपनी शक्ति और आयुर्वेद के ज्ञान के लिए जाने जाते थे। उन्हें च्यवनप्राश नामक एक विशेष जड़ी-बूटी पेस्ट के लिए भी जाना जाता है, जो कायाकल्प के लिए प्रसिद्ध है।
2.&3. – दो घड़ी और अनेक युग – अंतरिक्ष में जाने से इंसान की उम्र कम हो सकती है। यह “टाइम डिलेशन” नामक एक घटना के कारण होता है, जो आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत से संबंधित है। टाइम डिलेशन के कारण, अंतरिक्ष में बिताया गया समय पृथ्वी पर बिताए गए समय की तुलना में थोड़ा कम महसूस होता है।
उदाहरण – एक अध्ययन में, स्कॉट केली ने अंतरिक्ष में एक साल बिताया और उनके भाई मार्क की तुलना में 6 मिनट 10 मिलीसेकंड कम उम्र के पाए गए।
किसी ग्रह की बात करें तो शुक्र ग्रह पर सबसे बड़ा दिन होता है। शुक्र ग्रह पर एक दिन 243 पृथ्वी दिनों के बराबर होता है, जो कि पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर है।
शुक्र ग्रह का एक दिन लगभग 5,832 घंटे का होता है। शुक्र अपनी धुरी पर बहुत धीमी गति से घूमता है।
इस जानकारी से प्रश्न पड़ता हैं कि आकाश में कही कोई ऐसी जगह हैं क्या जहाँ दो घड़ी समय बिताने से पृथ्वी पर अनेक युग बीत जाये। इस वक्त तो ऐसी कोई जानकारी नहीं मिल पायी हैं। पर समय में अंतर आता हैं यह बात साबित हो चुकी हैं।
इस बात से एक फ़िल्म की याद आती हैं। 2014 में इंटरस्टेलर नाम से एक सायफाय मुव्ही रिलीज हुई थी जिसमें कुछ अंतरिक्ष यात्री 2067 में पृथ्वी जैसे किसी और ग्रह की खोज में निकलते हैं। उसमें से कूपर नाम का एक यात्री अपनी छोटी बेटी और बेटे को धरती पर पीछे छोड़कर उस यात्रा पर गया होता हैं।
वर्षों की यात्रा के बाद यात्री दल एक वर्म होल को पार कर के नये ग्रहों की खोज करने लगते हैं। उस यात्रा में अंतरिक्ष यान का एक्सीडेंट होता हैं, कूपर किसी तरह पृथ्वी पर दुबारा लौटने की कोशिश करता हैं पर ब्लैक होल में गिरकर खुद को चार आयामी टेसेरैक्ट में पाता हैं, जहाँ वह समय औऱ स्थान के माध्यम से यात्रा करके अपने खुद के बचपन के घर में पाता हैं। वह उस आयाम से अपने घर अपनी छोटी बेटी को देख पाता हैं पर उस तक पहुँच नहीं पाता।
काफी कोशिशों के बाद 2156 में वह अपनी कोशिश में कामयाब होता हैं और बेटी मर्फ़ से मिलता हैं जो तबतक बूढ़ी हो चुकी होती हैं।
कहानी के मुताबिक हॉस्पिटल के एक सिन में कूपर की बेटी मर्फ़ तो बूढ़ी दिखाई गयी हैं पर खुद कूपर जवान ही दिखाये गये हैं।
2067 में यात्रा पर निकला यात्री 2156 में ( याने 89 नवासी साल बाद ) फिर किसी तरह पृथ्वी पर वापस आता हैं। और इतने साल में उसकी छोटी बेटी बूढ़ी हो जाती हैं पर वह खुद जवान ही रहता हैं।
अगर आज का आधुनिक सायन्स भी टाईम डिलेशन की बात करता हैं, तो पुराणों में लिखें टाईम डिलेशन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
4&5. अयोध्या – अयोध्या शब्द का अर्थ है “अजेय शहर” या “जहां युद्ध न हो”। यह शब्द संस्कृत शब्द “युद्ध” से बना है, जिसका अर्थ है “लड़ना” या “युद्ध करना”। नकारात्मक उपसर्ग “अ” जुड़कर, यह शब्द “अयुद्ध” बन जाता है, जिसका अर्थ है “जहां युद्ध न हो”।
इस भाग में इतना ही।
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