Part – 10 pm ke pen se bate brahma puran ki :- प्रसेनजित, गौरी, गालव ऋषि का वर्णन

प्रसेनजित, गौरी, गालव ऋषि का वर्णन
हेमवती उर्फ़ दृषद्वती का पुत्र प्रसेनजित हुआ था, जो तीनों लोकों में विख्यात था।
प्रसेनजित ने गौरी नामवाली पतिव्रता स्त्री से ब्याह किया था, जो बादमें पति के शापसे (1. अ. जा.) बाहुदा नामकी नदी हो गयी। प्रसेनजित के पुत्र राजा युवनाश्व हुए। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए। वे त्रिभुवन विजयी थे। शशबिन्दु की सुशीला कन्या चैत्ररथी, जिसका दूसरा नाम बिन्दुमती भी था, मान्धाता की पत्नी हुई। इस भूतलपर उसके समान रूपवती स्त्री दूसरी नहीं थी। बिन्दुमती बड़ी पतिव्रता थी। वह दस हजार भाइयों की ज्येष्ठ भगिनी थी। मान्धाता ने उसके गर्भ से धर्मज्ञ पुरुकुत्स्थ और राजा मुचुकुन्द-ये दो पुत्र उत्पन्न किये। पुरुकुत्स्थ के उनकी स्त्री नर्मदा के गर्भ से राजा त्रसदस्यु उत्पन्न हुए, उनसे सम्भूत का जन्म हुआ। सम्भूत के पुत्र शत्रुदमन त्रिधन्वा हुए। राजा त्रिधन्वा से विद्वान त्रय्यारुण हुए।
त्रय्यारुण का पुत्र सत्यव्रत हुआ जो बलवान और दुर्बुद्ध था, उसने दूसरे के विवाह में विघ्न डालकर उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया। अपने ही किसी नगरवासी की कन्या का अपहरण किया गया हैं यह जानकर त्रय्यारुण ने अपने पुत्र सत्यव्रत को देश निकाला कर दिया।
पिता के त्यागने पर सत्यव्रत ने पूछा ‘आप त्याग दोगे तो मैं कहाँ जाऊँगा?’ उत्तर में त्रय्यारुण ने गुस्से में कहा ‘जा चांडालों के साथ रह। मुझे तेरे जैसे पुत्र की आवश्यकता नहीं।’ उस समय वहाँ उपस्थित वशिष्ठ जी ने भी उन्हें नहीं रोका।
सत्यव्रत के उस अधर्म के कारण इंद्र ने उस राज्य में वर्षा बंद कर दी।
उसी राज्य में विश्वामित्र भी रहते थे, जो समुद्र के पास तपस्या कर रहे थे। उनके पीछे उनकी पत्नीने अकालग्रस्त परिस्थिति में अपने मझले पुत्र के गले में रस्सी डालकर शेष परिवार के भरण पोषण के लिए उसे सौ गायों के ऐवज में बेच दिया।
राजकुमार सत्यव्रत जिसको अपने पिता ने त्याग दिया था उन्होंने विश्वामित्र की संतुष्टि और कृपा पाने के लिए उस रस्सी बंधे पुत्र को छुड़ा लिया और स्वयं उसका भरण पोषण किया।
विश्वामित्र का यह पुत्र गले में बंधन पड़ने के कारण गालव (2. अ. जा.) नाम से प्रसिद्ध हुआ।
राजकुमार सत्यव्रत भक्ति, दया और प्रतिज्ञावश विनयपूर्वक विश्वामित्रजी की स्त्री का पालन करने लगा। इससे मुनि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने सत्यव्रत से इच्छानुसार वर माँगने के लिये कहा। राजकुमार ने वर मांगा, ‘मैं इस शरीर के साथ ही स्वर्गलोक में चला जाऊँ।’
जब अनावृष्टि का भय दूर हो गया, तब विश्वामित्र ने उसे पिताके राज्यपर अभिषिक्त करके उसके द्वारा यज्ञ कराया। वे महातपस्वी थे, उन्होंने देवताओं तथा वसिष्ठ के देखते-देखते सत्यव्रत को शरीरसहित स्वर्गलोक में भेज दिया।
अधिक जानकारी
1. बहुदा नदी – बाहुदा नदी उत्तर प्रदेश में स्थित एक नदी है, जिसे “बूढ़ी राप्ती” के नाम से भी जाना जाता है।
2. ऋषि गालव – एक कथा के अनुसार, ऋषि गालव ने अपने गुरु विश्वामित्र को गुरुदक्षिणा में 800 श्यामकर्णी अश्व देने का वचन दिया था। उन विशेष अश्वों की प्राप्ति के लिए उन्होंने साठ हजार वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। जिसके फलस्वरूप उन्हें 600 श्यामकर्णी अश्वों और माधवी की प्राप्ति हुई, जिन्हें अपने गुरु को दक्षिणा में देकर उन्होंने अपना वचन पूरा किया। श्यामकर्णी अश्व का अर्थ है “काले कान वाला घोड़ा”। यह शब्द अक्सर महाभारत में उल्लेखित एक विशेष घोड़े के लिए प्रयोग किया जाता है, जो कृष्ण के पुत्र सांब के पास था। श्यामकर्णी अश्व को दिव्य और दुर्लभ माना जाता है। और इसका उपयोग यज्ञ के लिए किया जाता था।
इस भाग में इतना ही।

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